अप्पन गप्प

मैथिली भाषा आंदोलनक मुखपत्र मिथिला दर्शनक नाम कोनो प्रबुद्ध मैथिली भाषीक लेल नव नहि। परिवर्तित परिस्थितिक संग आजुक समय आ लोकक आशा-आकांक्षाक अनुरूप मिथिला दर्शन कें नवीन रूप-रंग आ विषय-वस्तुक संग प्रस्तुत कैल गेल अछि। पत्रिका मे मिथिलाक वत्र्तमान राजनैतिक, आर्थिक आ सामाजिक परिदृश्य, वितर्क आ समसामयिक लेख, वामा, सुश्रूषा, नेना भुटका, भानस भात, चौंसठि कला आ अपन धरोहरक संगहि समकालीन कथा, कविताक आ वितर्कक समावेश अछि।

मिथिला दर्शन प्रथम आत्म-प्रकाश कएने छल जनवरी, 1953 ई. मे। अपन नव रूप-रंग मे आइयो ई आन्दोलनक मुख-पत्र थिक। मिथिला-मैथिलीक अस्मिता-अस्तित्वक रक्षा, तकर उन्नति-विकास आइयो एकर उद्देश्य छैक। एक शब्द मे कहने मिथिला दर्शनक केन्द्र-बिन्दु थिक मिथिला, अपन समग्रता मे, अपन सम्पूर्णता मे। वर्तमान मे मिथिला वि·ा मानचित्र पर नहि अछि, भऽ सकैए एहि पर स्थान पयबा मे एकरा आर किछु समय लागि जाइ, किन्तु लेत धरि अवश्य, अपन सम्पूर्ण भाषा-प्रभाक संग। हमर विभूति लोकनिक आह्वान कहियो तऽ जन नेता लोकनिक विवेक कें वेधत, तरुण रक्त कें तरंगायित करत। अन्यथा भावक कनिञो-कोनो अवकाश नहि। किन्तु ताही संग इहो बिसरने काज नहि चलत जे मिथिला कोनो शंकरक त्रिशूल पर अवस्थित नहि अछि, एही धरती पर अछि आ तें धरती पर घटैत छोट-पैघ घटनाक प्रभाव एकरो पर पड़ैत छैक। आइ वै·ाीकरणक बिहाडि़ समस्त वि·ा कें दलमलित कएने अछि। एकर सर्वग्रासी नीति मात्र आर्थिक प्रभुत्व पएबा धरि सीमित नहि छैक। सामाजिक सरोकार कें राइ-छित्ती कए मानवीय स्नेह-संवेदना धरि कें बाजारू विकाउ वस्तु मे परिणत करबाक एकर प्रयासक बाट मे सभ सँ पैघ बाधक छैक भाषा-साहित्य-संस्कृति, तें एकर प्रथम आ प्रधान लक्ष्यो इएह थिक। आइ रोजे एक ने एक भाषा विलुप्त भए रहल अछि। साहित्यक दिशा-हीनता, सांस्कृतिक क्षरण – एकरे परिणत थिक जकर प्रतिरोध-प्रतिकार अनतिविलम्ब आवश्यके नहि अनिवार्य अछि।

1960 ई. मे मिथिला दर्शन प्राइवेट लिमिटेड नामक कम्पनीक गठन कएल गेल जकर परिवर्तित नामकरण भेल मिथिला दर्शन मीडिया प्राइवेट लिमिटेड।