मैथिली कविता

सत्रह बरख क उदयीमान कवि नचिकेता क संपादकत्व मे प्रगतिशील त्रैमासिक “मैथिली कविता” क प्रथम अंक अप्रैल १९६८ में प्रकाशित भेल छल। एहि पत्रिका क प्रकाशक छलाह आधुनिक मैथिली क आरम्भिक काल क महत्वपूर्ण महिला साहित्यकार, कवयित्री इला रानी सिंह। मैथिली भाषा मे नवचेतना क अग्रदूत मैथिली कविता क निरन्तर छह गोट अंक प्रकाशित भेल, आ एहि मे तत्कालीन सभ कवि क योगदान छल।  भारतीय सरकार क RNI रजिस्टर्ड (R.N.I. Regn No. 16549/67) एहि पत्रिका क अन्तिम अंक जुलाइ १९६९ मे प्रकाशित भेल।
सम्पादक नचिकेता क प्रथम अंक मे प्रकाशित सम्पादकीय, ‘दृष्टिपात’, एवं प्रकाशक इला रानी सिंह क शुभकामना संदेश सँ पथ-प्रदर्शक मैथिली कविता क उद्देश्य क जानकारी भेंटत।
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मैथिली कविता, वर्ष १ – अंक १; अप्रैल १९६८; दृष्टिपात (सम्पादकीय) पृ. ३१-३२
दृष्टिपात :-
रासत्मबोध सँ वंचित, विवेक और बुद्धियहु सँ विरहित, कवि-कर्म क दुरूहता सँ विमुक्त, फोकटिया यशक लिप्सा सँ अभिभूत, राष्ट्र-धर्म-संस्कृतिक विरोध कें कर्तव्य बुझनिहार, कुंठा, नपुंसकता, हीनता और संत्रास सँ निपीड़ित नव-रूढ़ि-जाल मे आबद्ध हैवाक प्रेमी एवं संकीर्ण सम्प्रदाय मे अन्तर्भुक्त तथाकथित साहित्यकार लोकनि क द्वारा नव-लेखन क नाम पर होमैवला व्यभिचार आई असह्य  भ’ गेल अछि। नवीनता क नाम पर पश्चिम क विकृति क अनुकरण और दुर्द्रव्यक सम्मिश्रण कैने क्यो बड़ जोर ‘अकवि’ भ’ सकैछ, कवि’ नहि।  नव कवि लोकनि कें सब वस्तु सँ विरोध छन्हि। पुरान नामहि सँ ई लोकनि तहिना भड़कैत छथि जेना कारी छत्ता सँ महींस। धर्म पूरान भा’ गेल छैक। तैं हिनका पसिन नहि। सामाजिक व्यवस्था पुरान भ’ गेल छैक। तैं हिनका वर्त्तमान समाज-व्यवस्था पसिन नहि। राष्ट्रीयता क नारा पुरान भ’ गेल छैक। तैं आब राष्ट्र-विरोध क नारा हिनका नीक लगैत छन्हि। अपन देश मे पसरल दुःख, दरिद्रता, अविद्या और कुरीति कें दूर करबाक लेल ई लोकनि शिव संकल्प नहि क’ सकैत छथि, कियैक त हिनका लोकनि क अन्त:करण विश्व-चेतना सँ उद्भभावित हैत रहैत छन्हि। चीनी साम्राज्यवादी  क गोली सँ बिद्ध तथा पद-दलित अपन भाई-बंधुक लहास हिनक ह्रदय विदीर्ण नहि  कैलकन्हि , किन्तु वियतनाम क गोली कांड सँ ई आई अश्रु-मोचन क रहल छथि। भारतवर्ष  में रहितहु बैशाख-जेठ क प्रचंड उत्तापहु मे ई लोकनि साइबेरिया निवासी सब जकाँ हू-हू  हू-हू क’ कए शीत सँ थर-थर काँपवाक स्वांग भरताह , कियैक त विश्व-चेतना सँ अनुप्राणित जे छथि ! अपन पास-पड़ोसिक क्रन्दन कें और निराशा कें बुझवाक हिनका पलखति नहि छन्हि, हुनका लोकनि कें सहयोग देबाक वा समाज क नव-निर्माण करवाक हिनका अवकाश नहि छन्हि, अपन माटि-पानिक दिसि निहारबाक हिनका दरकार नहि छन्हि, कियैक  त ताहि सँ विश्व-चेतना सँ अनुप्राणित हैवाक कोन प्रमाण भेंटतन्हि ? ई सत्य जे आजुक युग मे क्यो विश्व-भरि क घटना चक्र सँ अप्रभावित नहि रहि सकैत आ’ ने आयास-पूर्वक अप्रभावित रहबाक चाही, किन्तु इहो सत्य जे जकरा अपना घर, अपन समाज वा अपन देश क विभीषिका अनुप्रेरित नहीं क’ सकलैक से केवल आनहिक दयनीयता सँ प्रभावित हैवाक स्वांग करैत त ओ भयानक दम्भी और मिथ्याचारी (फ्रॉड) मानल जायत।
एहन विभ्रान्त कवि लोकनि क दू लक्षण विशेष उल्लेखनीय अछि। एक त ई अपने कें त्रिकाल मे सबसँ पैघ मानैत छथि — हिनाकाँ दृष्टियें बाल्मीकि, कालिदास, विद्यापति, तुलसी, सूर, चन्दा झा, सुमन, मधुप, किरण, सीताराम झा, आदि त कवि छाथिये नहि, ‘असल कविता’ त आई ई नव कवि लोकनि लिखी रहलाह अछि। नव कवि लोकनि क दोसर विशेषता ई छन्हि जे ई सब अपन सम्प्रदाय क चिट्ठा पर हस्ताक्षर कैनिहार और अपनहि साँचा मे ढलल शब्द-जाल मात्र कें कविता मानैत छथि, आन सब किछु कें फूसि-कासी। नेतृत्व क लोभें एहि दल मे कतेक बुढ़कौवो लोकनि कृत्रिम पंख लगा कए आबि गेल छथि। आजुक ई स्थिति विशेष विचारक अपेक्षा रखैत अछि।
आइ “मथिली कविता” पर बड़ पैघ दायित्व छैक। कवि लोकनि बड़ क्रान्त द्रष्टा हैत छथि। तैं हुनका लोकनि क ई पवित्र कर्तव्य छन्हि जे सशक्त स्वर मे ओ समाज क पथ निर्देश करथु और मैथिली साहित्य क गौरव-वर्द्धन करथु।
जनिका प्रतिभा छन्हि ओ कुहेलिका क अंधजाल क माया कें त्यागी दथु। पश्चिम क अनुकरण नहि क’ कए अपन धरती क माटि-पानि, अपन धरती क आशा-निराशा, अपन धरती क जीवन-संघर्ष दिसि ध्यान दथु। एहि प्रसंगे यात्री जी क ई कविता स्मरणीय आछि –
“— अवचेतन-मध्य
रहताह ठाढ़ मनुपुत्र, दिगम्बर
 ने जानि कत्तेक काल
पश्चिमाभिमुख।”
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आइ-काल्हि साहित्यांगन मे बहुत चलैत-फिरैत शव देखल जाईत अछि। ओ सब जन्म लेबाक साथे एहि लेल अपन माय-बाप कें गारि पाडैत छथि कियैक ओ सब एहि उद्देश्य-विहीन पृथ्वी पर हुनका सब कें जन्म देलन्हि। हम एहि पृथ्वी पर एलहुँ। जन्म लेलहुँ मिथिलाक माटि-पानी में। ताहि लेल हम अपना कें धन्य बुझैत छी।
समाज में अव्यवस्था अछि सुधारबाक लेल। जिनगी क टेढ़-घोंच, जटिल रास्ता मे दिशा बनाब’ पड़त। लड्डू लेल जिद्द ध’ कए नहि पैबाक व्यथता पर जीवन क देवाल ठाढ़ केनाई कापुरुषक काज थिक। जीवन क व्यर्थताक चित्रण मनुष्य क रीढ़ क हड्डी कें तोडि देत अछि। तोड़’ सब कें अबैत अछि, बना कें सकैत अछि ? हर्षक विषय जे “मैथिली कविता” बानैबाक कार्य-सूची हाथ मे नेने अछि; तोड़बाक नहि। हम ह्रदय सँ एकर समृद्धि आ’ दीर्घायु क लेल कामना करैत छी।
-प्रो० इला रानी सिंह, प्रकाशक, मैथिली कविता
[मैथिली कविता, वर्ष १ – अंक २; जुलाइ १९६८; शुभकामना, पृ. ६]

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