Late Anima Singh

स्व: अणिमा सिंह

मार्च 9, 2016 कें आजुक बंगलादेशक सुपुत्री अणिमा धर, जे वौवाहिक बन्धन मे आबद्ध भय मिथिला धामक वरेण्य विदुषी अणिमा सिंहक नामे विख्यात छथि, तनिक एहिलौकिक यात्रा पर पूर्ण विराम लागि गेल। ई एक ऐतिहासिक दिनक रूप मे सदा-सर्वदा मन राखल जायत, राखल जयबाक चाही। मन तऽ ओहो दिन राखल जयबाक चाहैत छल जहिया ई मिथिला विभूति प्रो. प्रबोध नारायण सिंहक पत्नीक रूप मे मौथिलानी शब्द के महिमा मंडित कएने छली। किन्तु 1950 ई.क ओ दिन एतेक भास्वर, एतेक आलोकमय प्राय: नहि छल होयत ! मिथिला देश मे, मौथिली साहित्य मे एक अभूतपूर्व आलोक वर्तिकाक आविर्भाव कें बहुतो लोक गंभीरताक संग नहि लेने होयता!

अणिमाजीक पिता सरकारी सेवा मे छलथिन आ स्वभावत: हुनक बदलीक संग हिनको स्थान परिवर्तित होइत रहल। पटनाक वीमेन्स कॉलेज सँ बी.ए. आ कलकत्ता विश्वविद्यालय सँ एम.ए. कएलनि। एतहि सँ डी.फिल. सेहो कएलनि। 1950 ई. मे प्रबोध बाबूक संग विवाह। प्रबोध बाबूक प्रथम पत्नी, इलारानी सिंहक मायक 1947 ई. मे लोकान्तर भऽ गेल छलनि। 1970 ई. मे प्रकाशित भेल हिनक अप्रतिम पोथी `मौथिली लोक गीत` जे एहि विधाक आधार ग्रंथक रूप मे मानल जाइछ। वस्तुत: एहि सँ पूर्व किंवा पश्चात् एहन दोसर ग्रंथ नहि प्रकाशित भऽ सकल।

अणिमाजी एहि सँ पूर्व `मिथिला दर्शन`क सम्पादन करैत छली। 1968 ई. मे गुजरातीक विख्यात लेखक श्री शिव कुमार जोशीक `सोनल छाया`क मौथिली `स्वर्णिम छाया` अनुवाद कऽ चुकल् ार्क कए, गीत गाइन वा गायक लोकनि सँ गीत गबा, तकरा रेकर्डिंग कए कऽ आनब साधारण बात नहि छल। आ सेहो सत्तरि सँ पहिने, जखन कि यातायात एक पौघ समस्या छल आ ताहू पर एक महिलाक लेल ! विशेषता देखू जे जकरा लोकनि सँ गीत लेलनि तिनको लोकनिक परिचय पोथीक शेष भाग मे देल गेल अछि। श्रद्धार्पणक एहन विलक्षण उदाहरण कतए भेटत ! अणिमाजी स्वयं लिखौत छथि : मौथिली लोकगीतक सम्पूर्ण सम्पदाक संरक्षणक लेल कैक लाख रुपयाक आवश्यकता छैक। सरकार एहि दिश सँ उदासीन अछि और आजुक युग मे साधारण व्यक्तिक लेल ई कार्य केनाइ कल्पनातीत अछि। कैक प्रकारक गीत एहन अछि जकर संग्रह विशेष ऋतु मे अथवा विशेष अवसरे पर कैल जा सकैत अछि। एहि लेल कैक वर्ष धरि विभिन्न ऋतु मे तथा विभिन्न अवस ा छली। किन्तु हुनक कृतित्व मे सर्वाधिक महत्वपूर्ण ग्रंथ थिक `मौथिली लोक गीत।` मिथिलाक गाम-गाम जा, विभिन्न समाज सँ सम्प्र पर हमरा बारम्बार कलकत्ता सँ मिथिलाक यात्रा करै पड़ल। शनौ: शनौ: ओहि ठामक पथ-प्रान्तर, खेत-पथार आ गाँव-घर सँ परिचय बढ़ैत गेल। परिचय आत्मीयता मे परिणत भेल और संग्रहक कार्य द्रुतगति सँ बढ़ैत रहल। कैक स्थानपर लोग हार्दिक स्वागत-सम्मान केलनि तऽ कैक स्थान पर उपहासक व्यंग्यवाणक लक्ष्य सेहो बनौलनि। कैकटा गाम मे बरसात मे चुबौत छप्परक नीचा उभर-खाभर भूमि पर तथा सीलन-भरल जमीन पर राति बिताबौ पड़ल और कैक स्थान पर देवोपम सुख-सुविधा सेहो उपलब्ध भेल। कखनहुँ मार्तण्डक प्रखर उत्ताप सहैत, कखनहुँ वर्षण-सिक्त, कर्दम लिप्त पथक व्यवधान कें तिरस्कृत करैत और कखनहुँ यान-वाहनक अभाव मे पौरे चोरबटिया सभक दूरी नापौत हम एक गाम सँ दोसर गाम मे घूमौत रहलहुँ और अपन काम करैत रहलहुँ। शारीरिक, मानसिक तथा प्राकृतिक विपर्यय प्रति पग मे बाधा पहुँचौलक। बाधा सँ उत्साह आरो बढ़ल। विशाल धन राशि और जीवनक बारह वर्ष लगा देबाक पश्चात् हम देखलहुँ जे उत्कृष्ट कोटिक तीन हजार सँ अधिक गीतक संग्रह नहि भऽ सकल और ई संग्रह पूरा कार्यक शतांशो नहि अछि। हम अपन प्रयासक क्षुद्रताक कारण लज्जित तथा कत्र्तव्यक दायित्वक प्रति सजग छी।` आश्चर्यक विषय जे हिनका सँ पूर्व एहि विषय पर, एकर महिमा-महत्ता-गुणवत्ता पर आन ककरो ध्यान नहि गेलौक। एकरा जँ दोसर तरहे कही तँ लोकभाषाक एहि अनमोल रत्नभंडार के मान्यता देबाक पक्ष मे मिथिलाक प्रबुद्ध वर्ग छलाहे नहि। स्मरण करू चर्यापद, ज्योतिरीश्वरक वर्णरत्नाकर आ कविपति विद्यापतिक पदावलीक कथा। पोथीक आशीर्वचन मे डॉ. सुभद्र झा लिखौत छथि : … ई संग्रह कोनो जाति विशेष मे प्रचलित गीतक संकलन नहि थीक तथा ने कोनो विशेष लक्ष्य के ध्यान मे राखि कएल गेल अछि। ई तऽ सम्पूर्ण मौथिली जीवनक अएना थीक, मौथिली संस्कृतिक प्रतिरुप थीक, मिथिलाक वास्तविक इतिहास थीक, मिथिलाक सामाजिक विज्ञान थीक तथा एहि मे मिथिलाक वास्तविक चित्र पाठक के सहज भेटि जएतौन्हि, मौथिलक लक्ष्य की, मौथिलक आदर्श की, मौथिलक दिनचर्या की, जे चाही से ज्ञात भए जाएत।` द फॉरमेशन ऑफ द मौथिली लैंगुएज` केर रचनाकार सुभद्र बाबूक मानसिकता सन यदि किछुओ प्रबुद्ध मौथिलक रहैत तऽ निश्चिते आइ दोसर दिन रहितौक। कखनो काल सोचौत छी जे ज्ञान-विज्ञानक भूमि मिथिला मे दीनेशचन्द्र सेन, विद्यासागर, आशुतोष मुखोपाध्याय, राखालचन्द्र सरकार आदि सन कोनो भू-भाषा प्रेमीक जन्म किएक नहि भेलौ !

 

बंगलाक विशिष्ट भाषाविद सुकुमार सेन अपन आशीर्वचन मे लिखौत छथि- Eastern Indian languages are very rich in folk verses and songs and among them Maithili perhaps tops the list. Attempt had been made to collect the folk songs in Tirhut but none had been wholehearted until Dr. Mrs. Anima Sinha came to the field.

रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालयक पूर्व उप-कुलपति डॉ. रमा चौधरीक अनुसार : Folk Literature is of immense value. Springing as it does from the very hearts, from the innermost souls,  from the hidden cores of the common-folk, it is entirely free from artificiality, pomposity or sophistication of any kind whatsoever, and thus, represents the Culture of a country in simplest, yet sweetest forms. Hence, it is that to know its culture and civilisation well, we have to know essentially its folk-literature well, also. आ एही सभ विषय-बात के ध्यान मे रखौत प्रबोध बाबू अणिमा सिंहजी के एहि असाध्य साधनक लेल प्रेरित कएने होएथिन, एहि विश्वासक संग जे ई तकरा करबा मे सक्षम छथि। आ अचरजक बात नहि जे अणिमाजी अपन सम्पूर्ण श्रद्धा-समर्पणक संग ताहि मे अप्रतिम सफलता प्राप्त करैत मौथिली साहित्यक इतिहास मे अमरत्व पओलनि। वस्तुत: ई एक एहन दृष्टान्त थिक जे अभिनव थिक, अतुलनीय थिक आ मिथिला मे त` दोसर नाम नहिञे भेटत।

अणिमाजीक एहि दू गोट पोथीक अतिरिक्त आर तीन गोट लोकगीतक पोथी छनि, किन्तु सभ ताही समयक। पश्चात् ई छोट-पौघ कतेको रचना कएलनि जे विभिन्न पत्रिका-स्मारिका सभ मे छिडि़ऐल अछि। हिनक पोथी नहि ऐबाक कारण अछि हिनक आदर्श पत्नी, आदर्श माता, आदर्श मातामहीक दायित्व के पूर्ण करब, आदर्श शिक्षिकाक भूमिका निमाहब। आ ई काज जे कतेक महत्वक अछि से कहबाक प्रयोजन नहि। अपना समाज मे सतमायक मादे जे भ्रान्ति अछि अणिमा जी तकर उत्तर छलीह। जेठ बालक रवीन्द्र भवनक प्राध्यापक आ छोट आयकर विभागक प्रिसिंपल कमिश्नर – एकर पृष्ठभूमि मे हिनक अवदान कें केना अस्वीकार कएल जायत ! एक बेर ओ अपने कहने छली जे अंक गणित मे हुनका शत-प्रतिशत नम्बर अबौत छलनि, परंच से छोडि़ ई हिन्दी पढ़लनि, हिन्दीए पढ़ौलनि। किन्तु मिथिला-मौथिलीक सम्बन्ध हिनक स्नेह मे कोनो परिवर्तन नहि भेल। एक बेर ओ स्वयं कहने छलीह जे जखन सिनेमा देखए जाथि आ कोनो बात बोधगम्य नहि होनि तऽ प्रबोध बाबू सँ पुछथिन। प्रबोध बाबूक उत्तर होइतनि जे मौथिली मे पुछू आ मौथिली मे पुछलाक बाद ओ बुझा दितथिन। सिखौक ई अभिनव कला ! मन पड़ैछ जे गोविन्द बाबूक पुरस्कृत पोथी `सामाक पौती`क गौरी सेन अनुवाद केने छलथिन, मुदा भूल-भ्रान्तिक कारणे ई तकरा आपस क` देने छलथिन। पश्चात् रमण जीक फोन आयल, ऑफिस मे नवीन जी पहुँचला – कहुना अणिमाजी पोथी पास कऽ देथिन से आग्रह करऽ लेल। पोथी फेर आएल छलौ। अणिमाजी के फोन कएल आ फेर एक दिन हुनका घर जा 10 बजे सँ पाँचबजे धरि रहि ओकरा संशोधन कय पठाओल गेलौ आ `झाँपी` नामे पोथी छपलौ। सामा-चकेबा बंगाल मे नहि होइत छैक तें `पौती`क अभाव। मौथिली रंगमंचक ओ अध्यक्षा छलीह। मिथिला दर्शन जे फेर सँ प्रकाशित भेल तकर समस्त रचनाक एक बेर प्रूफ देखि हम हुनका पठा दैत छलियनि आ ओ एक-एक पाँति मिला कें देखौत छली। सत्य कही तऽ मिथिला दर्शनक पुन: प्रकाशन जेना हुनका नव जीवन प्रदान कएने होनि। बेस उत्साहित छली। हिनक अवदान-योगदानक स्वीकृति स्वरूप कलकत्ताक विद्यापति स्मारक मंच एवं मिथिला सांस्कृतिक परिषद् हिनका अभिनन्दित कएने अछि, स्मारपत्र प्रदान कएने अछि।

15 सितम्बर 1924 ई. के हिनक जन्म भेल छलनि आ 09 मार्च, 2016 के दिवंगत भऽ गेली। मास तीनेक अस्वस्थ छली। हिनक निधनक संगहि कलकत्ता मौथिली आन्दोलनक एक अध्याय पर यवनिकापात भऽ गेल अवश्य मुदा अपन कृति मे ई तावतधरि जीवित रहती यावतधरि मौथिली भाषा, मौथिली साहित्य आ संस्कृति एवं अपन भू-भाषा प्रेमी मौथिल समाजक अस्तित्व अक्षुण्ण रहत। कारण संसार सत्य छैक। जन्मक संग मृत्यु भनहि स्वाभाविक होइ किन्तु कृति तँ चिरजीवी होइत अछि, कालातीत होइत अछि।

Late Anima Singh

Founder-Editor : Mithila Darshan

 Smt. Anima Singh (nee, Dhar) was born on 15th of September 1924 at Bombay to late Sri Suresh Chandra Dhar and Smt. Pankaj Dhar. As her father was employed with the Department of Military Accounts, a job requiring frequent transfers, Animaji’s early years were spent in various towns of northern India such as Meerut, Faizabad, Dehradun, Agra, etc.

Consequently, she had her schooling in all the aforesaid towns, ultimately completing her Matriculation from Agra in 1941. Always a meritorious student, she was awarded the merit scholarship for her performance in the Matriculate examination. Animaji passed her Intermediate examination in Arts from Meerut in 1943. In the same year, the family moved to Patna where she enrolled for her B.A. degree at the Patna Women’s College.

However, disaster struck the family soon thereafter when Animaji’s  mother passed away. Being the eldest daughter in a family of ten siblings, Animaji was burdened with the responsibility of bringing up all the younger brothers and sisters who looked up to her as the anchor as well as a role model. In 1946, in the midst of economic hardship and familial responsibility, she completed her graduation from Patna University topping the University with distinction.

In the meanwhile the family had shifted to Calcutta in the midst of great political and social turmoil caused by the aftermath of the Great Bengal Famine of 1943, the end of the Second World War and the impending partition of India. It was here that Animaji had a first hand experience of being a part of India’s struggle for freedom. It is an index of her political awareness that Animaji along with her sisters were called upon to sing bhajan at Mahatma Gandhis’ prayer meeting held in Calcutta in August 1947.

Around this time, Animaji’s father retired from service, leaving the family in dire financial straits. All this compelled her to suspend her higher studies and take up the job of a school teacher at Jalan Girls High School, Calcutta. Soon she was appointed the Headmistress of Mahila Shilpa Vidyalaya, a school at Chhapra in Bihar where she lived and worked for almost a year.

But her yearning for higher education made Animaji give up her job in 1948 and enroll in the University of Calcutta for Post Graduate Degree in Hindi literature. It was in the course of her studies for the M.A. Degree that she met and ultimately married her course mate Prabodh Narayan Singh. Married in 1950, Prabodh Babu and Animaji have two sons viz. Uday and Ajay.

Animaji’s involvement with the Maithili language movement began soon after her marriage when she and Prabodh Babu launched Mithila Darshan, the quarterly literary journal in Maithili. It was only due to the active involvement of Smt. Anima Singh on its editorial board and the intellectual ground work done by her that Mithila Darshan could be published consistently over the years. Animaji was the mainstay of the printing press established by Prabodh Babu from which so many important literary works in Maithili and Hindi were published. However, the most significant achievement of Animaji was her seminal work on Maithili folksongs for which she was awarded the Doctorate of Philosophy by the University of Calcutta in 1962.

Animaji’s painstaking effort to compile Maithili folk songs by undertaking tedious journey on the bullock cart along the length & breadth of Mithila is remembered to this day. Her well researched anthology of folk songs has also been published by the Sahitya Akademi and remains the most authentic and comprehensive work in this field. Apart from her Ph.D. thesis, Animaji has also authored a Maithili novel titled Swarnim Chhaya (translated from Gujarati) and a collection of short stories titled ‘Nari’. In recognition of her contribution to Maithili, specially in the realm of folk culture, she was awarded the Upendracharya Gold Medal in August, 1971 by Maithili Sahitya Sansthan, Patna and again felicitated by Chetana Samiti, Patna with a Tamra Patra in Novebmber, 2000.

Animaji has also been one of the leading lights of Akhil Bharatiya Mithila Sangh established in 1950s to spearhead the movement for the recognition of Maithili language. Although she has always desisted from holding any office in the organization, her support and involvement had contributed substantially to the furtherance of the cause of Maithili. The role played by Animaji’s home at Lake Gardens Kolkata in the progress of Maithili theatre movement in the 1960’s & 1970s is undisputed.

Although Animaji retired from Lady Brabourne College, Calcutta in 1990 after an academic career spanning 40 years, she continued to take active interest in ensuring media presence for Maithili language, literature and the arts by venturing into the field of audio-visual media. After the demise of her husband Prabodh Babu in 2005, Animaji produced the first ever television serial in Maithili titled ‘Nain Na Tirpit Bhel’ under the banner of Mithila Darshan Media Pvt. Ltd. The serial commenced on Doordarshan Bihar in February 2008 and ran for 78 episodes.  Besides, Animaji also produced a three-part documentary titled Mithilak Prabodh Babu, four short films based on classic stories and a Maithili music album. It is a testimony to her commitment to Maithili that the Mithila Darshan magazine was re-launched in 2009 as a bi-monthly journal and continued to be published till her demise in 2016.

Animaji passed away in Kolkata on 9th March, 2016 at the ripe old age of 92 years.